युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक है: डॉ. मनीषा दीवान

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डॉ. मनीषा दीवान.

लेखक: डॉ. मनीषा दीवान
विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग
एस.एन.सेन, पी.जी. कॉलेज

न्यूजलिंक हिंदी। इस रत्नगर्भा भारतीय धरा में जिन मनीषियों ने जन्म लेकर न केवल धार्मिक ,राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया अपितु सार्वभौमिक सुख, शांति समृद्धि, भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक दृष्टिकोण से संबंधित सशक्त एवं प्रमाणिक आधार प्रदान किया उन मनीषियों में स्वामी विवेकानंद का नाम सर्वोपरि है। स्वामी विवेकानंद जी का प्रादुर्भाव जिस काल में हुआ उस समय भारतीय समाज में अनेक कुरीतियों का समावेश हो चुका था एवं ऐसा लगता था मानो भारतीयता शीघ्र ही मिट जाएगी यह देश अंग्रेजों के अधीन रहकर पराधीनता का जीवन व्यतीत कर रहा था पराधीनता की बेड़ियों मे जकड़ा भारतीय समाज अपनी संस्कृति व गौरव को सर्वथा धुलिसात कर चुका था।

जिस समय राष्ट्र इस उदासीनता, निष्क्रियता और निराशा में डूबा हुआ था उस समय स्वामी विवेकानंद ने शक्ति व निर्भरता के संदेश की गर्जना की। प्रचंड तार्किक व वाग्विशारद होने के साथ ही तपस्या, ज्ञान, साधना से समुद्भासित उनका व्यक्तित्व चमत्कारी था उन्होंने ज्ञान योग, अभय और तेजस के मंत्र का विराट उद्घोष किया व समस्त मानव जाति के उन्नत भविष्य की ओर मार्गदर्शन किया विवेकानंद की बहुमुखी प्रतिभा उनके व्याख्यानों ,लेखो और वार्तालापों में व्यक्त होती थी।

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स्वामी विवेकानंद का दर्शन ,सिद्धांत तथा जिन आदर्शों का स्वयं उन्होंने पालन किया वे भारत के युवा वर्ग के लिए महान स्रोत थे व युवा पीढ़ी में नई ऊर्जा व शक्ति का संचार कर सकते हैं उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अब समय आ गया है भारत फिर से विश्व पर विजय प्राप्त करें यही मेरे जीवन का स्वप्न है और मैं चाहता हूं कि प्रत्येक जो मेरी बात सुन रहा है अपने मन में पोषण करें और उसे कार्य रूप में परिणत किए बिना न छोड़े हमारे सामने एक महान आदर्श है और प्रत्येक को इसके लिए तैयार रहना चाहिए यह आदर्श है भारत की विश्व पर विजय इससे कम कोई लक्ष्य या आदर्श नहीं चलेगा उठो भारत तुम अपने आध्यात्मिक शक्ति द्वारा विजय प्राप्त करो इस भगीरथ कार्य को संपन्न कौन करेगा ?तब स्वामी जी ने कहा “मेरी आशाएं युवा वर्ग पर टिकी हुई है”।स्वामी जी को युवा वर्ग की क्षमता व योग्यता पर पूरा विश्वास था इसीलिए वे युवाओं से कहते कि उठो! जागो लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत।

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स्वामी जी ने युवा वर्ग का आह्वान करते हुए आगे कहा था कि वह समाज ही उन्नति और उपलब्धियां के चरम शिखर पर पहुंच सकता है जहां व्यक्ति में चरित्र होता है उन्होंने युवा वर्ग को चरित्र निर्माण के पांच सूत्र दिए- आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, आत्मज्ञान, आत्म संयम और आत्म त्याग इनके अनुशीलन से व्यक्ति स्वयं के व्यक्तित्व ,देश व समाज का पुनर्निर्माण कर सकता है जब उस समय के युवा वर्ग ने स्वामी विवेकानंद के आह्वान को सुना तब भारत की स्वाधीनता का स्वप्न साकार हुआ किंतु स्वाधीनता के पश्चात स्वामी जी का दूसरा स्वप्न भारत की विश्व पर सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विजय अभी भी अधूरी है। आज युवा निरूद्देश्य व दिशा विहीन हो कर दिग्भ्रमित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में स्वामी विवेकानंद के विचारों को अपना कर ही युवा वर्ग को सार्थक दिशा दी जा सकती है आज अगर युवा वर्ग को समाज व राष्ट्र के समक्ष युवा शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना है तो युवाओं को उनके विचारों को आत्मसात करना पड़ेगा। क्योंकि स्वामी जी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने सौ वर्ष पहले।

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