न्यूज़लिंक हिंदी। देश में राम मंदिर का मुद्दा जाने कितने दशकों तक विवादित रहा है यह अब इतिहास के पन्नों में पूर्ण रूप से चर्चा में रहेगा। 22 जनवरी 2024 को देश ने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करके राम के विग्रह को गर्भ में पूर्ण रूप से स्थापित कर दिया गया।
साथ ही राम मंदिर लोगों के दर्शन के लिए भी खोल दिया गया, लेकिन राम मंदिर का विवाद कैसे शुरू हुआ और इतना लंबा क्यों चला यह भी एक किवदंती ही रह गई है। राम मंदिर का मुद्दा कई दशक पुराना है, कई पैरोकार दुनिया से चले गए जमीन का मसला धार्मिक बना और दो कौमों के बीच दरार बनकर अस्मिता का मुद्दा बन कर ही रह गया।
शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में पहले से क़ायम राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना भी चलती रहे। अदालत को अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिंदू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी और क्या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है।
1858 में हुई पहली एफआईआर: बाबरी मस्जिद बनने के लगभग 330 साल बाद 1858 मे पहली एफआईआर को पूर्ण रूप से दर्ज करवाई गई, हिन्दू पक्ष का कहना था कि जो मस्जिद बनी है उसके अंदर केवल एक चबूतरा है। उस समय मस्जिद के अंदर एक चबूतरा है। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत में वहां बाड़ लगाकर उसे 2 हिस्से में बांट दिया, यह विवादित ढ़ांचे के लिए पहली कानूनी लड़ाई और एफआईआर मानी जाती है।
अब आगे आजादी के बाद का मामला: 1986 में राजीव गांधी सरकार ने राम मंदिर का ताला खुलवाया ,मामला पहले से कोर्ट में था। इसे लेकर कोर्ट के तय करना था कि क़रीब सवा सौ साल पहले 1885 – 86 में अदालत के ज़रिए दिए गए फ़ैसले अभी लागू हैं, अदालत ने ये भी कहा था कि हिंदुओं के ज़रिए पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है।
लेकिन अब इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता, मामले को हल करने के लिए सरकारों ने कई बार संबंधित पक्षों की बातचीत कराई, लेकिन कोई निष्कर्ष नही निकला। लेकिन बातचीत में मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई अथवा नहीं यह भी तय नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1994 में इस मामले में अपनी राय देने से इनकार कर दिया कि क्या वहाँ कोई मंदिर तोड़कर कोई मस्जिद बनाई गई थी, मसला तय करने के लिए अदालत ने ज़ुबानी और दस्तावेज़ी सबूतों के अलावा पुरातात्विक खुदाई करवाकर एक रिपोर्ट को भी हासिल की थी, जिसमें मुख्य रूप से ये कहा गया था कि विवादित मस्जिद के नीचे खुदाई में मंदिर जैसी एक विशाल इमारत , खम्भे , एक शिव मंदिर और कुछ मूर्तियों के अवशेष भी मिले थे।
24 अक्टूबर 1994 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अब केवल उस स्थान का मालिकाना हक़ तय करना है जहाँ पर विवादित मस्जिद थी,इस तरह अब मात्र क़रीब आधा बिस्वा ज़मीन का मुकदमा बचा है। जीतने वाले पक्ष को अगल-बग़ल की अधिग्रहीत भूमि ज़रूरत के मुताबिक मिलेगी। उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक इस्माइल फारूकी मामले में कहा कि मस्जिद इस्लाम से जुड़ा हुआ नहीं है।
अप्रैल 2002- उच्च न्यायालय में विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर पूर्ण रूप से सुनवाई शुरू की,दोनों पक्षों के तरफ से अपने मालिकाना हक को भी पेश किया गया।
13 मार्च 2003- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि असलम उर्फ भूरे मामले में अधिग्रहित स्थल पर किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि की अनुमति कोई नहीं है, किसी तरह की धार्मिक गतिविधि न हो।
2003 में रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष अभी भी दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया।
तो वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष भी मिले हैं।
सितम्बर 2010- उच्चतम न्यायालय ने विवादित क्षेत्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांटने का भी आदेश दिया। 8 सितंबर 2010 को अदालत ने अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को फ़ैसला सुनाने की घोषणा की और 30 सितंबर 2010 को एक ऐतिहासिक फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया और तीन हिस्सों में बांट दिया गया।
मई 2011:उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या जमीन विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले पर पूर्ण रूप से रोक लगाई।
फरवरी 2016: सुब्रमण्यम स्वामी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाए जाने की भी मांग की।
21 मार्च 2017: सीजेआई जे एस खेहर ने संबंधित पक्षों के बीच अदालत के बाहर समाधान का भी सुझाव दिया।
अगस्त 2017: उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जो 1994 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पूर्ण रूप से सुनवाई करेगी।
अगस्त 2017: उत्तर प्रदेश शिया केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में भी मस्जिद बनाई जा सकती है।
सितम्बर 2017: उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि दस दिनों के अंदर दो अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करें जो विवादिस्त स्थल की यथास्थिति की पूर्ण रूप से निगरानी करे।
नवम्बर 2017: यूपी शिया केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि मंदिर का निर्माण अयोध्या में किया जा सकता है और मस्जिद का लखनऊ में किया जा सकता हैं।
दिसम्बर 2017: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को चुनौती देते हुए 32 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने याचिका दायर की।सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि अयोध्या विवाद मामले को आपसी बातचीत से ही सुलझा लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वे बातचीत की मध्यस्थता कर सकते हैं, उनके इस सुझाव का लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा के कई नेताओं ने स्वागत किया और 8 अगस्त 2017 को यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अयोध्या में विवादित जमीन से कुछ दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है।
फरवरी 2018 :सिविल याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने पूर्ण रूप से सुनवाई शुरू की।
मार्च 2018 :उच्चतम न्यायालय ने स्वामी की याचिका सहित सभी अंतरिम याचिकाओं को खारिज किया।
अप्रैल 2018: राजीव धवन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार के मुद्दे को बड़े पीठ के पास भेजने का पूर्ण आग्रह किया।
जुलाई 2018: यूपी सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि कुछ मुस्लिम समूह 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार की मांग कर सुनवाई में विलंब भी करना चाहते हैं।
जुलाई 2018: उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा।
सितम्बर 2018: उच्चतम न्यायालय ने मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष भेजने से इंकार किया, मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर को तीन सदस्यीय नयी पीठ में होगी।
अक्टूबर 2018: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई उचित पीठ के समक्ष जनवरी के पहले हफ्ते में तय की जो सुनवाई के समय पर ही निर्णय करेगी।
नवम्बर 2018-: अखिल भारत हिंदू महासभा की याचिकाओं पर जल्द सुनवाई से उच्चतम न्यायालय का पूर्ण रूप से इंकार
4 जनवरी 2019:उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मालिकाना हक मामले में सुनवाई की तारीख तय करने के लिए उसके द्वारा गठित उपयुक्त पीठ दस जनवरी को फैसला सुनाएगी।
8 जनवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया जिसकी अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई करेंगे और इसमें न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति एन वी रमन्ना, न्यायमूर्ति यू यू ललित और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ शामिल होंगे।
10 जनवरी 2019 : न्यायमूर्ति यू यू ललित ने मामले से खुद को अलग किया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नयी पीठ के समक्ष ही तय की।
25 जनवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन किया। नयी पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल थे।
26 फरवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता का सुझाव दिया और फैसले के लिए पांच मार्च की तारीख तय की जिसमें तय किया जाता कि मामले को अदालत की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाए अथवा नहीं।
6 मार्च 2019: उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा कि क्या जमीन विवाद को मध्यस्थता के माध्यम से समझाया जा सकता है या नहीं।
8 मार्च 2019: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या भूमि के मालिकाना हक से जुड़े विवाद के सर्वमान्य समाधान की संभावना तलाशने के लिए शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एफ. एम. आई. कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति गठित की। इस समिति के अन्य सदस्यों में आध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी पूर्ण रूप से शामिल हैं।
10 मई 2019: सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता समिति को 15 अगस्त तक का समय दिया। तीन-सदस्यीय मध्यस्थता समिति के प्रमुख न्यायमूर्ति एफ.एम.आई. कलीफुल्ला ने मध्यस्थता प्रयासों में अब तक हुई प्रगति पर अदालत में रिपोर्ट पेश करते हुए और समय देने की मांग की जिसके बाद अदालत ने समय बढ़ाने का आदेश दे दिया। उसके बाद कोर्ट ने लगातार सुनावाई करने का भी निर्णय लिया।
6 अगस्त 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन सुनवाई शुरू की. लगातार 40 दिनों तक मामले की सुनवाई पूर्ण रूप से की गई।
16 अक्टूबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी हुई और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
9 नवंबर 2019-134 साल से चली आ रही लड़ाई में अब वक्त था अंतिम फैसले का, 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित स्थल को श्रीराम जन्मभूमि माना और 2.77 एकड़ भूमि रामलला के स्वामित्व की ही मानी। वहीं, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया गया।
इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट निर्मोही अखाड़े के एक प्रतिनिधि को शामिल करने का भी निर्देश दिया, इसके अलावा उत्तर प्रदेश की सरकार को यह आदेश दिया कि मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक रूप से मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि किसी उपयुक्त स्थान पर उपलब्ध कराए।
5 फरवरी 2020 : 5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा भी की।
5 अगस्त 2020: को अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी गई, जिसमें पीएम मोदी भी शामिल हुए।
22 जनवरी 2024- अयोध्या में राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा. भव्य तरीके से राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की गई जिसमें भगवान श्रीराम के 51 इंच के श्याम वर्ण के विग्रह को स्थापित किया गया।

