न्यूज़लिंक हिंदी। राजकीय पक्षी सारस की प्रजाति पर संकट के बादल मुख्य रूप से मंडरा रहे हैं। इस प्रजाति को बचाने के लिए वन विभाग की ओर से मुख्य प्रयास भी किए जा रहे हैं लेकिन इनकी संख्या नहीं बढ़ पा रही है।
बीते तीन वर्षों में जिले से तीन सौ तीन सारस अपने कुनबे के साथ गायब हो गए हैं। सारस की घटती संख्या को लेकर वन विभाग के अफसर भी चिंतित हैं। वन्य जीव संरक्षण के लिए पूरी दुनिया मई माह के तीसरे शुक्रवार को राष्ट्रीय लुप्तप्राय प्रजाति दिवस के रूप में मनाती है।
इस दिवस पर सभी संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए वन्यजीव संरक्षण और बहाली के प्रयासों के महत्व के बारे में जानकारी देने के साथ ही जागरूक भी किया जाता है। लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम 1973, वन्यजीवों और संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा पर केंद्रित है।
वन विभाग के अफसरों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर के अनुसार पिछले दो दशकों में लुप्तप्राय प्रजातियों की संख्या पूरी दुनिया में दोगुणा से अधिक हो गई है।
संस्था के आकड़ों के अनुसार दुनिया में वन्य जीव की लगभग 31,000 से अधिक प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा है। यह सभी वन्य जीव प्रजातियों का लगभग 27 प्रतिशत है। इसी कड़ी में अब प्रदेश के राजकीय पक्षी सारस पर खतरा मंडराने लगा है।

