न्यूज़लिंक हिंदी। कानपुर और उन्नाव का चमड़ा उद्योग पिछले कुछ समय से नई समस्या से बुरी तरह से जूझ रहा है। बाजार में रॉ हाइड की जबर्दस्त कमी के बीच टैनरियां क्षमता से एक चौथाई तक ही चल पा रही हैं।
देसी बाजार में उपलब्ध हाइड के दाम दोगुने हो गए हैं। मजबूरी में कारोबारियों को दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के अलावा यूरोपीय देशों से प्रॉसेस्ड चमड़ा मंगाना बहुत ही पड़ रहा है। इससे इम्पोर्ट बिल भी बढ़ रहा है। जानकारों का कहना है कि ज्यादा मुनाफे की आड़ में रॉ हाइड के कम बिल बनाकर इसे विदेशों को भेजा जा रहा है।
बाद में इसे ही खरीदकर कारोबारी अपना काम चला रहे हैं। चमड़ा कारोबारियों के संगठन काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट की मांग है कि देश से कच्ची खालों का निर्यात तुरंत पूरी तरह रोका जाए। सरकारी रेकॉर्ड के मुताबिक कानपुर में 402 चमड़ा टैनरियां हैं। इन टैनरियों में मवेशियों की खालों को केमिकल से साफ किया जाता है।
कारोबारी नैय्यर जमाल ने बताया कि रॉ हाइड का कारोबार एक साइकल की तरह चलता है। जब मवेशी दूध देना बंद कर देते हैं, तो किसान इन्हें स्लॉटर हाउसों को मुख्य रूप से बेच देते हैं। स्लॉटर हाउसों से मिली कच्ची खाल ही प्रॉसेस कर इसे लेदर उत्पाद बनाए जाते हैं। बीते 4-5 महीने से कच्ची खालों के बाजार में अचानक नई समस्या सामने आई।
बाजार में 600-700 रुपये में मिलने वाली हाइड के दाम बढ़कर 1200-1300 रुपये अब हो गए। इसके पीछे पूरा तंत्र काम कर रहा है। अंडर बिलिंग के जरिए देसी कच्चे माल को थाईलैंड, वियतनाम, कंबोड़िया और बांग्लादेश को निर्यात किया जा रहा है। वहां प्रॉसेसिंग के बाद इसे आयात किया जा रहा है। इसका बुरा असर ये है कि कानपुर, उन्नाव की चमड़ा टैनरियों में प्रॉसेसिंग के काम में लगे हजारों मजदूर मजबूरी में खाली बैठे हैं।

