इस्लाम में रमजान का महीना बहुत ही मुबारक़ माना जाता है, जो कि इस्लामिक कैलेंडर का नौंवा महीना होता है। और माह-ए-रमजान को इबादत, रहमत और बरकतों वाला महीना ही माना गया है।
साथ ही रमजान-ए-पाक का महीना 1 मार्च से शुरू होने जा रहा है। हर मुसलमान के लिए ये महीना बहुत अहमियत रखता है।
रमजान के चांद का दीदार होने के साथ ही नमाजों, इबादतों और दुआओं का दौर भी शुरू हो जाता है। रमजान के महीने में मुसलमान रोजे रखते हैं और अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं।
माह-ए-रमजान में रोजे रखना हर एक मुसलमान पर फर्ज है, जो कि इस्लाम के 5 फर्ज में से एक है। इस्लाम में पांच फर्ज हैं: – शहादत, नमाज, रोजा, जकात और हज।
और ऐसे में रोजाना पांच वक्त की नमाज पढ़ना इस्लाम का एक बुनियादी हिस्सा है। इस्लाम धर्म में अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने वाले सभी लोगों पर नमाज फर्ज होती है, फिर चाहे वो मर्द हो या औरत, गरीब हो या अमीर, सभी लोगों के लिए 5 वक्त की नमाज पढ़ना बेहद ही जरूरी होता है।
रमजान के मुकद्दस महीने में पांच वक्त की नमाज के अलावा भी नमाज पढ़ जाती है, जिसे तरावीह कहा जाता है। रमजान में पढ़ी जाने वाली तरावीह की नमाज रोजाना पांच वक्त की नमाज से बहुत ही अलग होती है, जो कि रमजान में ईशा की नमाज के बाद अदा की जाती है। तरावीह की नमाज अदा करना सुन्नत माना गया है।
और इस्लाम में सुन्नत का मतलब आपकी अपनी मर्जी पर डिपेंड करता है, जिन्हें न करने पर कोई गुनाह नहीं होता, लेकिन करने पर ज्यादा सवाब मिलता है। सुन्नत का मतलब होता है पैगंबर मुहम्मद के बताए हुए नक्शे कदम पर चलना।
और वहीं, इस्लाम में, फर्ज नमाज वो नमाज होती है, जिसे पढ़ना हर मुसलमान पर फर्ज होता है। और फर्ज नमाज न पढ़ना गुनाह माना जाता है।
तरावीह की नमाज सुन्नत-ए-मुअक्कदा की नमाज होती है यानी इसे पढ़ना बेहद सवाब का काम है और इसे न पढ़ने पर कोई गुनाह भी नहीं मिलता है। इस्लाम में सुन्नत-ए-मुअक्कदा उस नमाज को कहते हैं, जिसे पैगंबर मुहम्मद ने हमेशा पढ़ा हो।
और ऐसा कहा जाता है कि पैगंबर साहब ने पहली मर्तबा रमजान में तरावीह की नमाज अदा की थी, इसलिए तब से तरावीह की नमाज पढ़ना सुन्नत माना जाता है। 20 रकात तरावीह की नमाज पढ़ना हदीसों से साबित मिलता है।
तरावीह की नमाज 2-2 रकात करके 20 रकातें पढ़ी जाती हैं, जबकि पांच वक्त की नमाज में 2, 4 या 3 रकातें होती हैं। तरावीह की नमाज की नियत में वक्त अलग नहीं होता है। और पांच वक्त की नमाज की नियत में वक्त अलग-अलग होता है।
तरावीह की नमाज में हर रकात में अलग-अलग सूरह पढ़ी जाती है, जबकि पांच वक्त की नमाज में कोई ऐसी पाबंदी नहीं होती है।
तरावीह की नमाज की फजीलत
मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी ने बताया कि तरावीह की नमाज में हर सजदे पर 1500 नेकियां लिखी जाती हैं। और अल्लाह तआला आसमान से तरावीह पढ़ने वाले लोगों को देखता है और उनपर अपनी रहमत को भी बरसाता है।
और इसलिए रमजान सबसे मुबारक महीना कहा जाता है। और इस पाक महीने में अल्लाह की रहमतें दुनिया पर बरसती हैं और इस महीने में की गई इबादतों का सवाब कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है।
और तरावीह की नमाज में हर रकात की शुरुआत सूरह अल-फातिहा से की जाती है। तरावीह की नमाज में दुआ में नमाजी अपने मुल्क की सलामती, परिवार की खुशियां और रोजी-रोजगार की दुआ मांगते हैं। तरावीह की नमाज पढ़ने से अल्लाह की रहमत और बरकत दोनों ही बनी रहती है।
साथ ही मर्दों के लिए तरावीह की नमाज जमात के साथ पढ़ना बेहतर है लेकिन अगर किसी वजह से वो मस्जिद में तरावीह की नमाज नहीं पढ़ सकता है, तो घर पर अकेले भी तरावीह की नमाज अदा की जा सकती है।
और औरतें तरावीह की नमाज घर पर ही पढ़ती हैं। पूरे रमजान मुबारक में तरावीह की नमाज पढ़ना और नमाज के बाद कुरआन का सुनना बेहद ही अच्छा और मुनासिब है।