अब महाकुंभ क्षेत्र में सन्नाटा है। अब भीड़ से न हमें परेशानी हो रही है, और न ही जाम में गाड़ी फंस रही है। कोई नो एंट्री दूर-दूर तक देखने को नहीं मिल रही। बेधड़क जिस घाट पर जाना हो जा सकते हैं। कोई दो पहिया वाहन चालक घाट तक पहुंचाने के लिसे पैसें एंठता नहीं दिख रहा। पार्किंग के लिये बड़ी-बड़ी जगह हैं। सरकार और प्रशासन को कोंसता भी कोई अभी तक नहीं मिला। तट सूने हैं…नहाने वाला भी कोई नहीं…मानों संगम नोज पर अमृत अब बचा नहीं। यही समय का महत्व है। कुछ क्षण पहले लोगों की दिवानगी अब वीरानगी में तब्दील हो गई है।
पर इस सन्नाटें पीछे एक बड़ा दिल दिख रहा है, वह प्रयागराज है। जिसने 45 दिनों तक देश और दुनिया के 66.30 करोड़ लोगों को प्रेम दिया। यह तो महज प्रमाणिक आंकड़े हैं शायद असलियत इससे भी ज्यादा खूबसूरत है। बिना किसी शिकायत के अपनी आबादी से ज्यादा लोगों को आसरा दिया, खाना दिया, पानी दिया खुद को घरों में समेटे हुये लोगों का बाहें पसारे इस्तकबाल किया। वाह प्रयागराज…कमाल कर दिया।
पह याद रखना हैं हमें मां गंगा तो वहीं हैं। जो वर्षों से हमारी प्यास बुझां रही हैं। अमृत समान हमें जीवनदान दें रही हैं। सुख और दुख के पर्वों पर हमें आंचल से छिपा लेने वाली मां गंगा तो वहीं है। जिसका मोल शायद हम नहीं चुका पाएंगे। हालांकि समय की गति निरंतर है। इसे रोका नहीं जा सकता। जीवन की हर एक क्षण का सही तरीके से उपयोग करना ही सफलता की कुंजी है। प्रयागराज ने हमें यह सिखाया।
45 दिनों तक देश दुनिया के लोगों ने भी समय का सदुपयोग किया…और अब समय की मांग के अनुरूप आगे बढ़ चलें हैं, फिर समय लौटेगा और अपने साथ अपार श्रद्धालुओं को लेकर आएगा। फिर से घाट गुलजार होंगे। समय पर नहाने की सबको जल्दी होगी। यह जीवन चक्र चलता रहेगा। एक बार फिर से प्रयागराज का आभार।