केंद्र सरकार का जाति जनगणना कराने का फैसला जल्दबाजी में लिया गया कोई फैसला नहीं बल्कि एक सोची समझी एक रणनीति का हिस्सा है।
सूत्रों को अनुसार सरकार ने ये फैसला कई फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए लिया है। और आला सरकारी सूत्रों के द्वारा जानकारी के अनुसार 2029 में महिला आरक्षण लागू करना, बिहार विधान सभा चुनाव में संदेश देना, मुस्लिम समुदाय में पिछड़ों की पहचान करना और विपक्ष के हाथ से मुद्दा छीनना भी सरकार का मकसद है।
ये भी बताया जा रहा है कि सरकार ने ये फैसला परिसीमन को ध्यान में रख कर भी किया है। सरकार जाति जनगणना के फैसले से पहलगाम आतंकी हमले से ध्यान हटाना कोशिश नहीं कर रही है।
साथ ही राजनीतिक हलकों में जाति जनगणना के फैसले की टाइमिंग को लेकर हैरानी है। और पूछा जा रहा है कि एक ऐसे वक्त जब सारा देश सांसें रोक कर पहलगाम आतंकी हमले के गुनहगारों को सजा देने का इंतजार कर रहा है, सरकार ने अचानक जाति जनगणना का फैसला क्यों कर लिया।
और इस पर आला सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं हुआ बल्कि इस पर पिछले कई महीनों से काम चल रहा था। और बीजेपी ने अपने मुख्यमंत्रियों और उपमुख्यमंत्रियों को इस बारे में आगाह कर दिया था।
सरकार के नेतृत्व की ओर से भी जाति जनगणना कराने के संकेत सार्वजनिक रूप से दे दिए गए थे। दरअसल,सरकार का मकसद है कि 2029 के लोक सभा चुनाव में एक तिहाई सीटें महिलाओं को आरक्षित करने के फैसले को लागू कर दिया जाए।
और वहीं परिसीमन पर लगा फ्रीज अगले साल हटने जा रहा है और उसके बाद परिसीमन आयोग का गठन होगा। आयोग को काम करने के लिए जनसंख्या के आंकड़ों की दरकार होगी और यह काम बिना जनगणना के नहीं हो सकेगा।
साथ ही सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जातीय जनगणना के बाद लोक सभा और विधानसभा में एससी एसटी आरक्षण की ही तरह ओबीसी के भी राजनीतिक आरक्षण की मांग उठाई जा सकती है।
लेकिन यह मांग पूरी कर पाना संभव नहीं है क्योंकि संविधान में केवल एससी एसटी के राजनीतिक आरक्षण का ही प्रावधान किया गया है।
और वहीं निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग उठाई जा सकती है लेकिन यह मांग बेमानी है । मनमोहन सिंह सरकार के समय भी निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठाई गई थी लेकिन इसका प्राइवेट सेक्टर ने इसका विरोध भी किया था। और कांग्रेस ने हाल ही में संविधान के अनुच्छेद 15(5) का मुद्दा भी उठाया है।