मकर संक्रांति के दिन लोगों के अंदर उमंग, उत्साह और मस्ती का प्रतीक पतंग उड़ाने की लंबे समय से चली आ रही परंपरा मौजूदा दौर में काफी बदलाव के बाद भी बरकरार है।
और फिर आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ में भले ही लोगों में पतंगबाजी का शौक कम हो गया है, लेकिन मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा आज भी बरकारार है।
फिर इसी परंपरा की वजह से मकर संक्रांति को पतंग पर्व भी कहा जाता है। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का वर्णन रामचरित मानस के बालकांड में मिलता है।
और फिर तुलसीदास ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘राम इन दिन चंग उड़ाई, इंद्रलोक में पहुंची जाई।’ मान्यता है कि मकर संक्रांति पर जब भगवान राम ने पतंग उड़ाई थी, जो इंद्रलोक भी पहुंच गई थी।
फिर उस समय से लेकर आज तक पतंग उड़ाने की परंपरा चली आ रही है। भगवान कृष्ण के पतंग उड़ाने की परंपरा का उल्लेख भारतीय लोककथाओं और भजनों में भी मिलता है।
कुछ भजनों और कहानियों में बताया गया है भगवान कृष्ण ने अपने मित्रों के साथ पतंग उड़ाई थी।
और फिर एक बार अर्जुन ने भगवान कृष्ण से ‘सफल जीवन’ के बारे में पूछा तो कृष्ण ने उन्हें पतंग उड़ाने के माध्यम से ये भी समझाया कि कैसे जीवन के धागे को सही दिशा में ले जाना चाहिए।
और फिर कुछ भजनों में राधा का भी उल्लेख है, जिसमें वह कृष्ण की पतंग काटती हैं, जो इस खेल को और भी रोचक बनाता है।
फिर वर्षों पुरानी यह परंपरा वर्तमान समय में भी बरकरार है। आकाश में रंग-बिरंगी अठखेलियां करती पतंग को देख हर किसी का मन पतंग उड़ाने के लिए लालायित भी हो उठता है।
प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन लोग चूड़ा-दही खाने के बाद मकानों की छतों तथा खुले मैदानों की ओर दौड़े चले जाते हैं तथा पतंग उड़ाकर दिन का मजा भी लेते हैं।
और फिर वर्तमान में कागज एवं प्लास्टिक की पतंगों का प्रचलन है। इनकी कीमत एक रुपए से पंद्रह रुपए तक है।

