प्लास्टिक, प्रदूषण और जलवायु के परिवर्तन बढ़ा रहा किडनी रोग, जानें विशेषज्ञों से जाने बचाव के तरीके

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आजकल जलवायु परिवर्तन, बढ़ते वायु प्रदूषण और प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग किडनी रोगों का खतरा बढ़ा रहा है।

और फिर युवा तेजी से बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। साथ ही जागरूकता से इस बीमारी से बचा जा सकता है।

इसी उद्देश्य से इस वर्ष विश्व किडनी दिवस की थीम पृथ्वी और पर्यावरण में हो रहे बदलावों का किडनी स्वास्थ्य पर प्रभाव पर केंद्रित किया गया है।

और फिर इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलाजी के सचिव व एसजीपीजीआई में नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद ने बताया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं।

और खून के माध्यम से किडनी तक पहुंच जाते हैं। फिर ये कण किडनी के ऊतकों में जमा होकर सूजन और नुकसान पैदा कर सकते हैं।

और अधिक गर्मी के कारण शरीर में बार-बार हल्की किडनी चोट हो सकती है, जो धीरे-धीरे स्थायी क्षति में बदलकर क्रॉनिक किडनी डिजीज का रूप ले सकती है।

और फिर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से जुड़ी मेटाबोलिक किडनी बीमारी भी तेजी से बढ़ रही है।

इस स्थिति में पेशाब में एल्ब्यूमिन का रिसाव होने लगता है और धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम भी होती जाती है।

इसके अलावा डॉ. नारायण के अनुसार कुछ आधुनिक दवाएं जैसे सेमाग्लूटाइड, रेनिन-एंजियोटेंसिन सिस्टम ब्लॉकर्स और नॉन-स्टेरॉयडल मिनरलोकोर्टिकोइड रिसेप्टर एंटागोनिस्ट चिकित्सकीय निगरानी में शुरू करने से किडनी रोग की प्रगति 40 से 70 प्रतिशत तक धीमी भी की जा सकती है।

फिर कई मामलों में इससे डायलिसिस की जरूरत 5 से 10 वर्ष तक टाली भी जा सकती है।

और फिर एसजीपीजीआई से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक एक साल के भीतर 111 महिलाओं ने किडनी डोनेट की है।

जबकि ऐसा करने वाले पुरुष सिर्फ 16 हैं। इन महिलाओं ने पति, बेटों, बेटियों को किडनी भी दान की है।

इसके अलावा डॉ. नारायण प्रसाद का कहना है काम को लेकर लोग तनावग्रस्त हो रहे हैं। और फिर सिर दर्द होने पर तत्काल दर्द निवारक दवा ले लेते हैं।

शरीर में अन्य पीड़ा होने पर भी दर्द निवारक दवाओं का सेवन अंधाधुंध भी किया जा रहा है। अत्यधिक दर्द निवारण दवाएं किडनी पर बुरा प्रभाव डालती हैं।

और फिर विशेषज्ञों के अनुसार जीवनशैली में बदलाव लाकर किडनी रोग के खतरे को काफी हद तक कम भी किया जा सकता है।

फिर इसके लिए शरीर का बीएमआई 25 से कम रखना, रोजाना 500 से 700 कैलोरी कम लेना भी हैं।

और फिर सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम करना, प्रतिदिन 0.8 ग्राम प्रति किलोग्राम के हिसाब से प्रोटीन लेना और नमक का सेवन 5 ग्राम से कम रखना भी बेहद जरूरी है।

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