तालाब या स्विमिंग पूल में नहाना पड़ सकता है भारी, बच्ची का दिमाग खा गया ये खतरनाक जीव

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न्यूज़लिंक हिंदी। एक छोटा सा जीव इंसान का दिमाग खा सकता है। आंखों से न दिखाई देने वाला दुनिया का यह छोटा जीव इतना खतरनाक है कि इससे मेडिकल जगत भी पार नहीं पा सका है। इसे अमर माना जाता है, यानी यह मारने से भी नहीं मरता है। यह बेहद गर्म वातावरण में पानी में पनपता है। ऐसे में गर्मियों में गंदे तालाब या वाटर पार्क में नहाना किसी के लिए भारी पड़ सकता है।

हाल ही में केरल में 5 साल की बच्ची की एक गंदे तालाब में नहाने के बाद मौत हो गई। बताया जा रहा है कि लड़की को एक दुर्लभ इन्फेक्शन ‘नेग्लेरिया फाउलरी’ हो गया था। यह संक्रमण ब्रेन ईटिंग अमीबा यानी दिमाग खाने वाले अमीबा से होता है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे यह अमीबा खूब फलता-फूलता है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार, नेग्लेरिया फाउलरी इन्फेक्शन को प्राइमरी अमीबिक मेनिनगोएन्सेफिलाइटिस कहा जाता है। यह संक्रमण नेग्लेरिया फाउलरी नाम के एक फ्री लिविंग अमीबा से होता है। अमीबा में एक ही कोशिका होती है। इसी वजह से यह अपना आकार बदलता रहता है और यह कभी मरता नहीं है। इसकी सबसे पहले खोज 1960 के दशक में ऑस्ट्रेलिया में हुई थी। मगर अमेरिका में इसका परिवार खूब फला-फूला।

रांची में इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर रविकांत चतुर्वेदी के अनुसार, यह घातक अमीबा पूरी दुनिया में पाया जाता है। यह गर्म ताजे पानी में रहता है। तैरने या नहाने के दौरान यह अमीबा नाक के रास्ते शरीर में घुसता है। यह अमीबा ज्यादा तापमान यानी 46 डिग्री सेंटीग्रेड पर तेजी से पनपता है और अपना परिवार बढ़ाता है।

यह खतरनाक अमीबा झील, नदियों, तालाबों, स्विमिंग पूल, स्प्लैश पैड्स, सर्फ पार्क, वाटर पार्क जैसी गर्म ताजे पानी वाली जगहों पर ज्यादा तेजी से पनपता है। खासकर पानी वाली उन जगहों पर इसे अपना परिवार बढ़ाना ज्यादा पसंद है, जहां साफ-सफाई का ख्याल नहीं रखा जाता है और न ही क्लोरीन या ब्लीचिंग पाउडर से पानी का ट्रीटमेंट किया जाता है।

तैरने वाली या नहाने वाली सार्वजनिक जगहों पर नहाते या तैराकी करते समय नेग्लेरिया फाउलरी अमीबा नाक के रास्ते शरीर में घुसता है और वहां से यह ब्रेन में चला जाता है। दिमाग में घुसते ही यह अमीबा दिमाग की कोशिकाओं और ऊतकों को नष्ट करने लगता है। इस वजह से दिमाग में सूजन बढ़ जाती है।

डॉक्टर के अनुसार, यह इन्फेक्शन संक्रामक नहीं है। भले ही पीने के पानी में यह अमीबा हो, मगर उससे यह नहीं फैलता है। अगर किसी ने गलती से दूषित पानी पी लिया है तो भी उसे यह संक्रमण नहीं होगा। यह केवल नाक के रास्ते ही दिमाग तक जाने वाली नर्व कोशिकाओं से ही जाता है।

शुरुआती लक्षणों में सिरदर्द, बुखार, जुकाम और उल्टी जैसी समस्याएं होती हैं। बाद में मरीज को गर्दन में अकड़पन, भ्रम होना, कन्फ्यूजन होना और कोमा में जाने जैसी हालत हो जाती है। अमेरिका की सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन की स्टडी के अनुसार, इस संक्रमण से पीड़ित मरीज की 1 से 18 दिन के भीतर मौत हो जाती है। कोमा में जाने के बाद ज्यादा से ज्यादा 5 दिन तक कोई मरीज जिंदा रह पाता है।

डॉ. चतुर्वेदी कहते हैं कि यह बीमारी इतनी घातक है कि अभी तक इसका कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। फिलहाल डॉक्टर कई तरह की दवाएं देते हैं, मगर यह मरीज पर असर हो, यह जरूरी नहीं है। भारत में अमीबिक मेनिनगोएन्सिफिलाइटिस के अब तक 20 केस सामने आ चुके हैं। केरल में इस बीमारी का पहला केस 2016 में सामने आया था।

गर्म मौसम के दौरान खासकर किसी तालाब या वाटर पार्क या स्विमिंग पूल में तैराकी करते समय नाक पर क्लिप पहनने से दूषित पानी को नाक में जाने से रोका जा सकता है। सिर को पानी के ऊपर रखने से भी दूषित पानी को नाक में जाने से रोका जा सकता है। किसी को भी झीलों, तालाबों और नदियों के तल पर तलछट खोदने या हिलाने से भी बचना चाहिए, क्योंकि यहीं पर अमीबा के रहने की सबसे अधिक संभावना होती है।

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