राहुल गांधी के जाति जनगणना बयान पर चिराग ने दिया समर्थन, मोदी सरकार के सभी फैसलों पर चिराग ने जताई आपत्ति

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न्यूज़लिंक हिंदी। चिराग केंद्र में पद मिलने के बाद राजनीति में अपने कद पर अब विशेष ध्यान देने लगे हैं। जब तक केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन एनडीए से दूर रहे तब तक खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते रहे।

लेकिन जैसे ही एनडीए सरकार में जगह मिली, ‘वोकल फॉर लोकल’ हो गए। यह प्रधानमंत्री मोदी का दिया मंत्र है। चिराग ने अपनी लोकल कंस्टिट्यूएंसी के लिए इतने वोकल हो गए कि अब यह नारा देने वाले ही सांसत में फंस ही रह गए हैं।

चिराग ने एससी-एसटी की जातियों में उपवर्गीकरण, वक्फ संशोधन विधेयक, लेटरल एंट्री से केंद्रीय सचिवालय में भर्तियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बाद अब जाति जनगणना के पक्ष में बैटिंग करने लगे हैं। यूं तो उन्होंने वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध नहीं किया है, लेकिन संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग करने वाले मोदी सरकार के अकेले मंत्री जरूर हैं।

जिस तरह वक्फ विधेयक को जेपीसी में भेजने की मांग विपक्ष की थी, उसी तरह एससी-एसटी में उपवर्गीकरण और लेटर एंट्री से भर्तियों का विरोध भी विपक्ष ने ही किया। इन सबके अगुआ खासकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं। चिराग ने इन सभी मुद्दों पर राहुल की लाइन ही ली है। अब जब राहुल ने सीधे-सीधे पीएम मोदी को चुनौती देकर कहा है कि वो देशव्यापी जाति जनगणना करवाकर रहेंगे तो चिराग ने यहां भी सुर में सुर मुख्य रूप से मिला दिया गया है।

चिराग ने जाति-जनगणना पर कहा है, मेरी पार्टी का जाति जनगणना के पक्ष में हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है। हम जाति जनगणना चाहते हैं क्योंकि कई बार केंद्र और राज्य, दोनों सरकारें जाति को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाती हैं। ये योजनाएं विभिन्न जातियों को मुख्य धारा में लाने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। उन्होंने आगे कहा, ऐसी परिस्थिति में सरकारों के पास हरेक जाति की आबादी के सटीक आंकड़े रहने चाहिए।

सरकार में शामिल होने का यह कतई मतलब नहीं कि उसके हर फैसले का पूर्ण समर्थन किया जाए। आखिर लोकतांत्रिक भावना को बल तभी मिल पाएगा जब विशेष मुद्दों पर विपक्ष ही नहीं सत्ता पक्ष के अंदर से भी मुख्य आवाजें उठें। लोकतंत्र तब और मजबूत होगा जब विपक्ष भी सिर्फ विरोध के लिए नहीं बल्कि मुद्दा आधारित विरोध करे।

सत्ता पक्ष के अंदर से मुख्य आवाजें उठें, इस पर भला किसे भी और कैसे बभी आपत्ति हो सकती है! लेकिन आपत्ति कब, कहां और किस रूप में सामने आ रही है, इसका गुना-गणित तो संयुक्त रूप से लगाना पड़ता है। आखिर राजनीति में कुछ यूं ही नहीं हो जाता, सबके पीछे सोची-समझी रणनीति ही होती है।

 

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