जानिए वसंत पंचमी पर क्यों सजाई जाती है संत हजरत निजामुद्दीन की दरगाह, पढ़ें पूरी खबर

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वसंत पंचमी का त्योहार देश भर में धूमधाम से मनाई जाती है, इस दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की आराधना भी की जाती है। शिक्षण संस्थानों में भी विशेष आयोजन भी किए जाते हैं।

यह त्योहार एक स्थान पर हिन्दू और मुसलमान मिलकर मनाते हैं। वह है सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह। वसंत पंचमी पर पूरी दरगाह पीले फूलों से सजाई जाती है। वसंत के आगमन की खुशी में यह दरगाह जीवन और उम्मीदों के नवीनीकरण का प्रतीक भी बन जाती है।

दिल्ली में स्थित सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर वसंत का आयोजन धूमधाम से किया जाता है, पूरी दरगाह को फूलों से सजाया जाता है। कव्वाली का आयोजन भी होता है।

दरअसल, हजरत निजामुद्दीन औलिया चिश्तिया सिलसिला के सूफी संत भी थे। बताया जाता है कि उनका पूरा नाम हजरत शेख ख्वाजा सैय्यद मोहम्मद निजामुद्दीन औलिया था। उनका जन्म साल 1228 में उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुआ था।

इस सिलसिले की शुरुआत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने की थी। उनकी दरगाह राजस्थान के अजमेर में स्थित भी है।

हजरत निजामुद्दीन औलिया के अपनी कोई संतान नहीं थी, उनको अपनी बहन के बेटे ख्वाजा तकीउद्दीन नूंह से काफी लगाव भी था। ख्वाजा नूंह का एक दिन बीमारी के कारण निधन हो गया।

इससे हजरत निजामुद्दीन औलिया काफी दुखी भी रहने लगे। और उन्होंने अपने निवास स्थान चीला-ए-खानकाह से निकलना बंद भी कर दिया।

और एक दिन की बात है अमीर खुसरो ने गांव की महिलाओं के एक ग्रुप को पीले कपड़े पहन कर, सरसों के फूल लेकर ख्वाजा के चीला-ए-खानकाह के पास से सड़क पर गाते हुए जाते हुए भी देखा।

खुसरो ने उन महिलाओं को रोक कर पूछा कि वे ऐसे कपड़े पहन कर और फूल लेकर कहां जा रही हैं? इस पर महिलाओं ने उत्तर दिया कि वे अपने ईश्वर को फूल चढ़ाने के लिए मंदिर की ओर जा रही हैं।

खुसरो ने फिर उनसे पूछा कि क्या इस तरह से उनके भगवान खुश हो जाएंगे? महिलाओं ने जवाब दिया कि जी हां, ऐसा ही होगा।

यह सुनकर बस खुसरो को आइडिया मिल गया। उन्होंने तुरंत पीली साड़ी पहनी। सरसों के फूल लिए और संत निजामुद्दीन औलिया के सामने सकल बन फूल रही सरसों… गाते हुए पहुंच गए।

उस दिन अमीर खुसरो की वेशभूषा देख और उनके गीत से हजरत निजामुद्दीन औलिया प्रसन्न ही हो गए। उनके चेहरे पर लंबे समय बाद आखिरकार मुस्कान आ ही गई।

इसके बाद से वहां वसंत पंचमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा। तब से लेकर आज तक हर साल वसंत पंचमी पर हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह को सजाया ही जाता है।

और वसंत पंचमी मनाने के लिए उनके सभी अनुयायी पीले कपड़े पहनते हैं, सरसों के फूल लेकर दरगाह ही जाते हैं और कव्वाली गाकर वसंत के आगमन का जश्न भी मनाते हैं।

बस, इसीलिए 800 सालों से भी अधिक समय से यह पर्व हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर इसी तरह से मनाया जा रहा है।

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