स्मार्ट फोन बन रहा काल, अभिभावकों की अनजानी गलतियां बच्चों का दिमाग कर रहा कमजोर

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तकनीकी और गैजेट्स के बढ़ते इस्तेमाल के कारण आजकल हर घर में ये नजारा आम है।

और फिर बच्चे स्मार्ट फोन पर अपना अधिक समय बिता रहे हैं और अभिभावकों को ये बात स्माभाविक ही लगती हैं।

लेकिन, ये बातें स्वाभाविक नहीं, बल्कि अभिभावकों की ओर से अनजाने में की जा रहीं गलतियां हैं जो बच्चों की दिमागी क्षमताएं कमजोरी कर रही हैं।

इसके साथ ही इंटरनेट से बढ़ते इस्तेमाल और स्मार्ट फोने के जरिये आसान पहुंच के कारण बहुत कम उम्र से ही बच्चों को इसकी लत लग जाती है।

आनलाइन क्लासेस, इंटरनेट मीडिया पर अस्तित्व, आसानी से असानमेंट पूरा करने समेत तमाम कारण बताकर बच्चे खुद का स्मार्ट फोन भी हासिल कर लेतें हैं।

लेकिन ये स्मार्ट फोन उन्हें स्मार्ट न बनाकर उनके दिमाग से खेलेने भी लगता है।और फिर ये वे युवा थे जिन्हें 12 साल से पहले अपना खुदा का स्मार्ट फोन मिल गया था।

इसे जर्नल आफ ह्यूमन डेवलपमेंमट एंड कैपेबिलिटीज में प्रकाशित किया गया है। और फिर अध्ययन में बताया गया है कि कम उम्र में अधिक समय वर्चुअल दुनिया में बिताने के कारण बच्चे बड़े होकर असल और वर्चुअल दुनिया में फर्क भी नहीं कर पाते हैं।

इसके साथ ही जीएसवीएम मेडिकल कालेज के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डा. धनंजय चौधरी बताते हैं कि बाल रोग व मनोरोग की ओपीडी में हर दिन 60 से ज्यादा युवा व बच्चे ऐसे पहुंच रहे हैं।

जो मोबाइल व अधिक स्क्रीन टाइम के तली हैं। और फिर उनके मुताबिक, लंबे समय तक स्मार्ट फोन का प्रयोग करने से सोचने व समझने की शक्ति प्रभावित भी हो रही है।

फिर इस कारण युवा वर्ग में तनाव व बच्चों में चिड़चिड़ापन की समस्या बढ़ रही है।और फिर आगे उन्होंने बताया कि नौबस्ता के 12 वर्ष के बच्चे का इलाज एलएलआर के बाल रोग व मनोरोग विभाग में चल रहा है।

अभिभावकों ने बताया कि बच्चा कई दिन से स्मार्टफोन पर वीडियो देखे बिना बिना भोजन तक नहीं करता था। फिर मना करने या स्मार्ट फोन न देने पर छीनने पर खुद को नुकसान पहुंचाने लगता है।

फिर इसके अलावा कल्याणपुर के 14 वर्षीय बच्चे का इलाज किया जा रहा है जो चार से पांच घंटे तक मोबाइल पर वीडियो देखता था।

फिर इस कारण उसकी आंखें कमजोर हो गईं थी व कम शारीरिक गतिविधि के कारण विकास भी नहीं हो पा रहा था।

उसका उपचार नेत्र रोग विभाग की विशेषज्ञों की देखरेख में बाल रोग विभाग में किया जा रहा है। यह एक दो उदाहरण स्थिति को समझने के लिए बेहद काफी हैं।

इतना ही नहीं छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के क्ललीनिक साइक्लोलाजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर सृजन श्रीवास्तव के अनुसार 12–13 वर्ष की आयु से स्मार्टफोन का उपयोग शुरू करने वाले बच्चों में कई तरह की भावनात्मक और व्यवहारिक समस्याएं भी मिल रही है।

और फिर वहीँ 10–12 वर्ष की उम्र के बच्चों में भावनात्मक अस्थिरता, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, ध्यान की कमी, सामाजिक अलगाव और नींद की समस्या तेजी से बढ़ भी रही है।

और फिर ऐसे बच्चों के विस्तृत मनोवैज्ञानिक आकलन करते हैं, तो लगभग हर मामले में यह पाया जाता है कि बच्चे बहुत कम उम्र (8–12 वर्ष) में ही बिना किसी निगरानी के स्मार्टफोन का उपयोग भी शुरू कर देते हैं।

और फिर वह बताते हैं कि ओपीडी में आने वाले बच्चे बताते हैं कि मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने पर वे बेचैनी, घबराहट या खालीपन महसूस करते हैं, जो डिजिटल निर्भरता के शुरुआती संकेत भी हैं।

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