शिक्षक दिवस 2025 : जो सिखा जाए…वही गुरु कहलाए

कहते हैं माँ-पापा और भाई पहले गुरु होते हैं।

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Dr. Amreen Fatima

लेखक
डॉ. आमरीन फातिमा
एमडी (लंदन) मेडिसिन, गोल्ड मेडलिस्ट

“ना गुरुकुल की दीवार चाहिए, ना ऊँचा कोई नाम…जहाँ भी मिले जीवन की सीख, वही बने मेरा गुरुधाम…” शिक्षक दिवस केवल एक तारीख नहीं, यह एक एहसास है उन सब के लिए जिनसे हमने कुछ सीखा, जो हमारी सोच को आकार देते हैं, जो हमारे जीवन में दीपक की तरह जलते हैं जब हम अंधेरे में होते हैं। यह केवल शब्द नहीं, एक जीवन-दर्शन है, जो रगों में उतर जाए, आत्मा को छू जाए। शिक्षा की असली परिभाषा किताबों की मोटाई में नहीं, बल्कि उस सोच में छिपी होती है जो किसी को दूसरों का दर्द समझने लायक बना दे। आज का युग ज्ञान का नहीं, बुद्धि और संवेदना का है। ज़रूरी नहीं कि जो स्कूल में पढ़ा रहा है, वही शिक्षक हो। कभी एक बच्चा, कभी कोई छोटा जानवर, कभी कोई अनजान राहगीर, हम सबको कहीं न कहीं जीवन का पाठ पढ़ा जाते हैं। कहते हैं माँ-पापा और भाई पहले गुरु, पहले दीपक जब शब्द नहीं आते थे, तो माँ की ममता ने पढ़ना सिखाया। जब रास्ते उलझे थे, तक पापा के अनुभवों ने समझाया। और जब हिम्मत डगमगाई तो भाई की मुस्कान ही सहारा बन आई। पहले शिक्षक ना कोई प्रिंसिपल थे, ना कोई प्रोफेसर। वो तो उनके अपने माँ-पापा और भाई थे, जिन्होंने बिना डिग्री के उन्हें ज़िंदगी जीना सिखाया। माँ ने मौन की भाषा सिखाई, पापा ने सच्चाई का रास्ता और भाई ने सपनों को पकड़ने का साहस।

गुरु: वो जो आत्मा तक पहुंचे, “जो आंखों से नहीं, आत्मा से पढ़ाए वो गुरु। जो डाँटे नहीं, पर मौन से समझा दे वो गुरु। शिक्षक केवल वो नहीं जो क्लास में पढ़ाए, बल्कि वो भी है जो ज़िंदगी में चुपचाप हमारे पीछे चलता है। जैसे परछाई, जैसे आशीर्वाद। एक बार एक घायल पक्षी ने उन्हें धैर्य सिखाया। एक बार सड़क पर मिट्टी में खेलते बच्चों ने निर्मल आनंद का पाठ पढ़ाया। एक बूढ़ी अम्मा ने संघर्ष में मुस्कुराना सिखाया। डिग्रियों की चमक से ज़्यादा ज़रूरी है अनुभव की रोशनी। एक अच्छा शिक्षक वह है जो अपने विद्यार्थियों को किताबों से ज़्यादा ज़िंदगी का पाठ पढ़ाए। जो उन्हें बताए कि हार में भी जीत छिपी होती है, और आँसू भी कभी-कभी शिक्षक बन जाते हैं। कहतें हैं हर जीव एक शिक्षक है। कभी एक चींटी ने मुझे अनुशासन सिखाया, तो एक पत्ते ने सहना। हवा ने मुझे आज़ादी सिखाई, और मिट्टी ने झुकना…शायद इसीलिए कहा गया है।

“आचार्याद् पादमादत्ते, पादं शिष्यः स्वमेधया। पादं सब्रह्मचारिभ्यः, पादं कालक्रमेण च॥”

विद्यार्थी अपने ज्ञान का एक चौथाई गुरु से, एक चौथाई अपनी बुद्धि से, एक चौथाई साथियों से और शेष समय के साथ प्राप्त करता है। “हर वो जो सिखाए, चाहे शब्दों में, या मौन में… उन्हें आज हम करें नमन, हर दिल, हर कोने से…” आज की भागती-दौड़ती दुनिया को एक ठहराव का पल देता है। जहाँ हम अपने जीवन में आए हर उस चेहरे को याद करें, जिसने हमें बेहतर इंसान बनाए। तो इस शिक्षक दिवस पर…आइए हम केवल फूलों का गुलदस्ता न दें, बल्कि अपने गुरुओं के सिखाए मूल्यों को जीवन में उतारें। आइए सिर्फ उन्हें याद न करें जो हमें पढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें भी जो हमें जगाते हैं। और सबसे ज़रूरी…खुद भी बनें किसी के जीवन के शिक्षक।

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