न्यूज़लिंक हिंदी। दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक एक तरह से राजनीतिक रूप से फिर से जीवित होने का प्रयास है। तीन महीने तक विपक्षी गुट ने लगभग इस स्तर के रणनीतिक संवाद को रोक दिया था क्योंकि कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों को प्राथमिकता दी थी।कांग्रेस की हुई हार से इंडिया गठबंधन की राह और भी आसान हो गई ,विपक्ष की मुश्किल है कि उसके पास मोदी के मुकाबिले में कोई और चेहरा नहीं हैं।
इसे अनुकूल विधानसभा परिणामों के साथ आंशिक रूप से ठीक किया जा सकता था, लेकिन हुआ यह कि बीजेपी को तीन राज्यों में हारने के बाद, इंडी अलायंस का प्रमुख साथी कांग्रेस तबाह हो गई है। इससे महत्वपूर्ण हिंदी पट्टी पर बीजेपी के वर्चस्व की धारणा मजबूत हुई है। इसलिए विपक्ष के सामने एक बहुत चुनौतीपूर्ण परिस्थिति खड़ी हो गई है। आइए, विपक्ष के लिए कुछ सांत्वना के बिंदुओं से शुरू करते हैं।
कांग्रेस की हार से सीट-बंटवारे पर महत्वपूर्ण समझौतों की गति तेज हो सकती है, क्योंकि अब कांग्रेस कमजोर हो गई है और उसके सहयोगी दल अधिक आक्रामक हो गए हैं। इससे समान स्तर का माहौल बन रहा है। बेशक, शुरुआत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और एक बैठक स्थगित कर दी गई।
वहीं, सपा, टीएमसी और जेडीयू नेताओं ने कांग्रेस के एकतरफा फैसलों से असंतुष्ट होकर बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया था। लेकिन अब अधिकांश दलों ने अपने सांसदों के निलंबन के बाद एक-दूसरे के प्रति रुख को नरम किया है।
जेडीएस के शामिल होने से एनडीए फिर मजबूत हो गया है। जातिगत जनगणना पर ज्यादा जोर देने का नुकसान भी सामने आया है। कांग्रेस की कर्नाटक सरकार सर्वे रिपोर्ट को रोक कर बैठी है। डर है कि लिंगायत और वोक्कालिगा जातियों का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ेगा। ओबीसी नेता सिद्धरमैया और वोक्कालिगा लीडर डीके शिवकुमार भी जातिगत जनगणना की जरूरत को लेकर अपनी अलग-अलग राय रखते हैं।

