न्यूज़लिंक हिंदी। आज देश की सेनाओं के शौर्य का विजय दिवस। सेना के जवानों के अदम्य साहस के बल पर 60 दिन तक चले इस युद्ध में जवानों ने पाकिस्तानी सेना को बहुत ही करारी शिकस्त दी थी।
इस युद्ध में शहर के शूरवीरों ने भी अपने साहस के दम पर दुश्मनों को घुटने टेकने को मजबूर किया था। पैर में गोली धंसने के बाद भी वह चोटी पर कब्जा जमाए रहे। युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था। लगातार गोलियां चल रही थीं पर न खून की परवाह की न दर्द की। बस एक ही जज्बा था कि युद्ध जीतना है।
25 साल पहले हुए इस युद्ध में एक जवान ने हैंडग्रेनेड के हमले से अपने साथियों को बचाते हुए गहरे जख्म खाए। 50 से ज्यादा ऑपरेशन के बाद भी देश सेवा के प्रति उनका जज्बा आज भी बरकरार है। उनका एक बेटा सेना में जाने की तैयारी भी कर रहा है। कल्याणपुर आवास विकास निवासी अजीत सिंह राष्ट्रीय राइफल में सिपाही थे।
कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें असम से बुलाकर कुपवाड़ा भेजा गया था। जब ऊंची बर्फीली पहाड़ियों पर छिपा बैठा दुश्मन हैंडग्रेनेड से हमला कर रहा था, तब वे भी मुस्तैदी से जवाब दे रहे थे। वह बताते हैं कि इसी बीच दुश्मन का एक हैंडग्रेनेड उनके पास आकर गिरा। साथियों को बचाने के लिए उन्होंने हैंडग्रेनेड उठाकर फेंका तो वो फट गया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
50 से ज्यादा ऑपरेशनों के बाद अजीत की जिंदगी बच पाई थी लेकिन हौसला आज भी उनका आसमान पर बरकरार है। वे अपने बेटे को सेना में बड़ा अफसर बनाना चाहते हैं। बताया कि बड़े बेटे देवराज स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। इसके साथ सीडीएस और सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि 20 साथियों के साथ बफीर्ली चोटी पर चढ़े। इस दौरान दुश्मन गोलियां बरसा रहे थे। दुश्मनों को खत्म करने के जुनून में सभी साथी तेजी से चोटी पर चढ़े और दुश्मन का बंकर नष्ट करके पांच पाकिस्तानी सैनिकों को खत्म किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके चार साथी शहीद हो गए। उनके बाय जांघ पर गोली लग गई।
इस दौरान बर्फ की पट्टी बांधी और बर्फ को पिघलाकर तीन दिन तक पानी पीते रहे और चोटी पर डटे रहे। 26 जुलाई को सीज फायर होने के बाद ही चोटी से नीचे आए। 13 कुमाऊं रेजिमेंट में सिपाही रहे चकेरी के दहेली सुजानपुर निवासी सतेंद्र यादव कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों से लड़ते-लड़ते बॉर्डर पार चले गए थे।
जहां दुश्मनों की गोलाबारी का जवाब देते समय हुए विस्फोट में वे भी शहीद हो गए थे। सतेंद्र के पिता को बेटे की शहादत पर गर्व है। वहीं, चाचा के शौर्य से प्रेरित होकर उनके भतीजे भी सेना में जाना चाहते हैं। शहीद के पिता अयोध्या प्रसाद कहते हैं कि सतेंद्र का जिक्र होते ही जहां आंखें सम्पूर्ण रूप से भर आती हैं वहीं, सीना गर्व से चौड़ा भी हो जाता है। बेटे ने दुश्मनों को घर में घुसकर मारा।

