बकरीद पर कुर्बानी करने से पहले, क्यों गिने जाते हैं बकरे के दांत, किन्हें नहीं देना चाहिए कुर्बानी

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बकरा ईद का त्योहार इस्लामिक कौम का एक बहुत ही अहम त्योहार है। और इस त्योहार में बकरे सहित कुछ जानवरों की कुर्बानी भी दी जाती है।

और इस साल भारत में 7 जून को बकरीद यानि ईद उल अजहा मनाई जाएगी। और तारीख का ऐलान दस दिन पहले चांद दिखने के बाद ही किया गया।

बकरीद, ईद उल फितर के 2 महीने 9 दिन बाद ही मनाई जाती है। और इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने जुल-हिज्जा के दसवें दिन बकरीद मनाई जाती है।

बकरा ईद को क़ुर्बानी का त्यौहार मन जाता हैं। और ये परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस्लाम के प्रमुख पैगंबरों में से हजरत इब्राहिम की वजह से कुर्बानी देने की परंपरा शुरू हुई।

और माना जाता है कि अल्‍लाह ने एक बार पैगंबर इब्राहिम के ख्‍वाब में आकर उनसे उनकी सबसे प्‍यारी चीज कुर्बान करने को भी कहा। और इब्राहिम को अपनी इकलौती औलाद उनका बेटा इस्माइल सबसे अजीज था।

हजरत इब्राहिम 80 साल की उम्र में पिता बने थे। लेकिन अल्लाह के हुक्म के आगे वह बेटे को कुर्बान करने को तैयार हो गए। और उन्होंने अपनी आंख पर पट्टी बांधकर जैसे ही बेटे की गर्दन पर छुरा रखा, तभी उसकी जगह दुंबा आ गया।

और फिर तभी से बकरा ईद का त्योहार मनाया जाता आ रहा है।और यह तो सब जानते हैं कि बकरा ईद पर बकरे की कुर्बानी दी जाती है। लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि बकरे की कुर्बानी से पहले उसके दांत गिने जाते हैं। दरअसल दांत गिनकर बकरे की उम्र का पता लगाया जाता है।

क्योंकि कुर्बानी एक साल के बकरे की ही दी जाती है। और उससे कम उम्र के बकरे की कुर्बानी जायज नहीं होती। जब बकरे के दांत 4-6 हो तो माना जाता है कि वह एक साल का है। और उससे कम दांत होने पर उसकी कुर्बानी नहीं दी जाएगी।

वह 6 से ज्यादा दांत होने पर भी बकरे की कुर्बानी जायज नहीं है। ये भी कहा जाए तो बकरीद पर न ही नवजात और न ही बुजुर्ग बकरे की कुर्बानी दी जाती है।

राजगढ़ शहर काजी सैयद नाजिम अली ने ये भी बताया कि , ”बकरे के दांत इसलिए नहीं देखे और गिने जाते की वो दांत वाला है या नहीं। बल्कि दांतों से उसकी उम्र का अंदाजा भी लगाया जाता है कि, बकरे की उम्र एक साल पूरी हो गई है या नहीं।

क्योंकि कुर्बानी के लिए बकरे का एक साल का होना जरूरी है। और यदि उसके दो दांत हैं तो उसने एक साल पूरा कर लिया है, और यदि कोई बकरा स्वयं का पाला हुआ है और उसके दो दांत नहीं भी हैं। और उसने एक साल पूरा कर लिया है तो वह भी कुर्बानी के लिए जायज भी है।

और फिर कुर्बानी के लिए जानवर आंख बंद कर नहीं खरीदे जाते हैं। और उन्हें खरीदने के कुछ नियम भी तय है। और जैसे बकरा या कुर्बानी का कोई भी जानवर बीमार न हो, उसे कोई चोट न लगी हो।

और फिर बकरे के सींग टूटे हुए न हों और उसकी उम्र एक साल हो गई हो। जब आप बकरा खरीदने जाएं तो बकरे की अच्छे से जांच कर लें कि वह बीमार तो नहीं है। बीमारी का पता लगाना भी मुश्किल काम है।

लेकिन बकरों में हो रहे बदलाव से बीमारी का पता लगाया जा सकता है। और जिस बकरे की आंखें हल्की गुलाबी या पूरी तरह से सफेद हो गई है तो इसका मतलब बकरे के पेट में पैरासाइड हैं जो उसका खून चूस रहे हैं।

साथ ही ईद उल अजहा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद में मनाई भी जाती है। और फिर ईद पर सबसे पहले सुबह ईदगाह और मस्जिदों में नमाज अदा की जाती उसके बाद कुर्बानी भी दी जाती है।

और फिर कुर्बानी हर उस बंदे पर फर्ज है जिसके पास 50 हजार से अधिक रकम भी हो। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर कुर्बानी बिल्कुल भी फर्ज नहीं है।

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