मुस्लिमों के आरक्षण मुद्दे को लेकर भाजपा विरोध क्यों कर रही,मुस्लिम आरक्षण की संवैधानिक स्थिति को जानिए

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न्यूज़लिंक हिंदी। जब हमारे देश का संविधान बनाने के लिए बनी संविधान सभा में बहुत ही ज्यादा बहस चल रही थी। उसी दौरान जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में एक प्रस्ताव को पूर्ण रूप से पेश किया। इस प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के बारे में बात की गई थी। सभा में इस प्रस्ताव को लेकर मुस्लिम लीग ने आपत्ति भी जताई।

उसका कहना था कि भारतीय संविधान में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए आरक्षण दिए जाने का प्रावधान ही किया जाए। हालांकि, नेहरू ने मुस्लिमों के साथ बाकी अल्पसंख्यक समूहों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग का भी विरोध किया। नेहरू ने इस बारे में मुस्लिम लीग के चेयरमैन मुहम्मद अली जिन्ना को पत्र लिखकर बताया भी था।

सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल भी अल्पसंख्यकों को किसी भी तरह का आरक्षण दिए जाने के खिलाफ थे। हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि संविधान में केंद्र और राज्य सरकारों को यह देखना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी मिल रहा है या नहीं। समिति की मांगें संविधान सभा ने मांग लीं, मगर मुस्लिम लीग अब भी राजी नहीं था।

वह अब भी पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग पूर्ण रूप से कर रहा था। यही बात भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की वजह से ही बनी। संविधान सभा में उठी मुस्लिमों के आरक्षण की यह बात मौजूदा चुनावी माहौल फिर से गरमा गई है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को तेलंगाना की एक रैली में कहा- जब तक मैं जीवित हूं, किसी भी कीमत पर संविधान की ओर से दिए गए एससी-एसटी और ओबीसी के आरक्षण को मुसलमानों को नहीं बांटने दूंगा।

1909 और 1919 में भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान पूर्ण किया गया। 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी में जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया गया, जिसमें गैर ब्राह्मणों को 44 फीसदी, ब्राह्मणों को 16 फीसदी, मुस्लिमों को 16 फीसदी, एंग्लो-इंडियन को 16 फीसदी और अनुसूचित जातियों को 8 फीसदी आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था पूर्ण की गई।

इससे पहले 1895 में मैसूर की रियासत में पुलिस विभाग में ब्राह्मणों, मुसलमानों और दूसरी हिंदू जातियों को आबादी के हिसाब से सरकारी सेवाओं में स्थान आरक्षित किए गए। जब हालात नहीं सुधरे तब मैसूर के महाराजा ने तत्कालीन हाईकोर्ट के जज सर एलसी मिलर की अगुवाई में एक कमेटी बनाई। मिलर कमेटी ने पिछड़ा वर्ग की परिभाषा जाति और वर्ग के आधार पर तय की और उसमें मुस्लिमों को भी शामिल किया। क्योंकि इनका प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं में नहीं था।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई बताते हैं कि मुस्लिमों को आरक्षण महज एक चुनावी मुद्दा है। किसी को इस मामले से ज्यादा लेना-देना नहीं है। जैसे ही चुनाव खत्म होंगे, ये मुद्दा भी अपने आप ही खत्म हो जाएगा। वहीं लीगल एक्सपर्ट और एडवोकेट शिवाजी शुक्ला कहते हैं कि मौजूदा वक्त में अन्य पिछड़ा वर्ग में ही मुस्लिमों को आरक्षण में मिल रहा है। क्योंकि आरक्षण देने की यह कैटेगरी धार्मिक या जातिगत समूह से इतर है।

वैसे भी संविधान के तहत धर्म के आधार पर किसी को आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। मुस्लिमों को भी अलग से आरक्षण देना असंवैधानिक होगा। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी किसी को पिछड़ा मानने के कई पैरामीटर तय किए हैं-जैसे कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से कोई समुदाय पिछड़ा है तो उसे ओबीसी कैटेगरी में शामिल भी किया जा सकता है।

2006 में सच्चर कमेटी ने भी यह बताया था कि मुस्लिम समुदाय हिंदू ओबीसी वर्ग से भी पिछड़ा हुआ है। इसी के आधार पर केरल सरकार ने मुस्लिम समुदाय को नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण दिए जाने की सिफारिश भी की थी। फिलहाल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में मुस्लिमों को आरक्षण दिए जाने का मामला अदालत में है।

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