उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर, अब जिसे ब्रिटिश काल में ‘कवनपोर’ और बाद में ‘मैनचेस्टर ऑफ इंडिया’ के रूप में ही जाना जाता था, आज भी अपने ठेठ और मस्तमौला ‘कानपुरिया’ अंदाज के लिए ही पहचाना जाता है।
लेकिन इस मस्तमौला अंदाज के पीछे अब एक तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास की एक मजबूत तस्वीर छिपी है।
फिर चमड़ा उद्योग और ‘मुन्ना समोसा’ जैसी स्थानीय पहचानों से आगे बढ़कर, कानपुर अब मेट्रो और एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए ‘बढ़ते उत्तर प्रदेश’ का एक प्रमुख ग्रोथ इंजनभी बन रहा है।
फिर शहर में लगभग 11,000 करोड़ से अधिक की लागत से 32 किलोमीटर लंबा मेट्रो नेटवर्क तैयार भी किया जा रहा है।
और आईआईटी से कानपुर से मोतीझील तक इसका पहला चरण न केवल चालू हो चुका है, बल्कि यह देश के सबसे तेजी से पूरे होने वाले मेट्रो प्रोजेक्ट्स में से एक ही है।
कानपुर को एक प्रमुख नोड के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी ‘अडानी डिफेंस और एयरोस्पेस’ और सुविधा स्थापित की गई है।
साथ ही कानपुर का चमड़ा उद्योग भारत के निर्यात क्षेत्र में एक बहुत बड़ा योगदान देता है।
फिर यहाँ का बना चमड़ा अमेरिका, मध्य पूर्व और यूरोप के बाजारों में निर्यात भी किया जाता है, जिससे देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
फिर इसके साथ ही, अगर कानपुर की बात हो और यहाँ के खान-पान का जिक्र न हो, तो यह अधूरा है।
और कानपुर का ‘मुन्ना समोसा’, जो केवल एक दुकान नहीं बल्कि एक ब्रांड भी बन चुका है, एक जिला एक उत्पाद के तहत ही अपनी एक अलग पहचान भी बना रहा है।
इसके अलावा कानपुर ने समय के साथ खुद को बदला है। 1857 की क्रांति के समय का ‘कवनपोर’ आज ‘न्यू कानपुर’ बन चुका है। फिर जहाँ कभी फैक्ट्रियों के सायरन और चिमनियों का धुआं इसकी पहचान थे।
आज फिर वहीं आज मेट्रो की रफ्तार, डिफेंस कॉरिडोर की आधुनिकता और मजबूत कनेक्टिविटी इसे ‘विकसित भारत’ और ‘दौड़ते उत्तर प्रदेश’ का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बना रहे हैं।