Kanpur News : 400 सालों से चली आ रही एक अनोखी परंपरा, बांस-कागज नहीं, बल्कि सीमेंट से बने रावण का होता है वध

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नर्वल के मंधना-पाली में 404वें वर्ष रामलीला मंचन लगातार चल रहा है। और फिर सीमित संसाधनों के बीच ही अभिनय के माध्यम से ही कलाकार मानस के मर्म को जीवंत कर मंचन में सजीवता ला देते हैं।

और फिर ग्रामीण बताते हैं कि मुगलकाल में जहांगीर के शासनकाल से यहां की लीला की शुरुआत भी हुई थी।

साथ ही यहां रावण का पुतला बने न जले। बल्कि सीमेंट की विशालकाय रावण की प्रतिमा स्थापित है।

और फिर दशहरा वाले दिन श्रीराम व लक्ष्मण काठ के घोड़े पर सवार होकर रावण की प्रतिमा के पास ही पहुंचते हैं। फिर इसके बाद राम-रावण का युद्ध होता है।

रावण का वध होते ही प्रभु राम की जय-जयकार होने लगती है। और इसी दिन गांव में मेला भी लगता है।

इसके साथ ही मंधना निवासी बुजुर्ग सुशील कुमार दीक्षित ‘दद्दा’ बताते हैं कि वर्ष 1623 में मुगल शासन काल में लीला की शुरुआत भी की गई थी।

और गांव व क्षेत्रीय लोग ही मंचन में अभिनय करते हैं। फिर काठ के घोड़े लगभग 150 वर्ष से अधिक प्राचीन हैं। युवा प्रतीक दीक्षित ने बताया नवमी वाले दिन मां काली की मनोहर झांकी के दर्शन भी होते हैं।

इसके अलावा मंधना गांव निवासी व वर्तमान में लखनऊ स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय के प्रभारी, वरिष्ठ भाजपा और नेता भारत दीक्षित हर साल नवमी से लेकर लीला के समापन तक गांव में रुकते हैं और फिर लीला में सहभागी बनते हैं।

और फिर भारत दीक्षित बचपन में यहां की रामलीला में हनुमान भी बनते थे और भगवान शिव का अद्भुत शृंगार भी करते थे। उनका शिव शृंगार बहुत प्रसिद्ध था।

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