महाराजपुर में 1991 में हुई मुठभेड़ की कहानी सीबीसीआईडी की जांच में अब गलत निकली है।
और फर्जी मुठभेड़ में 35 साल बाद 12 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज भी कराया गया है।
ये भी बता दें कि मामले में 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच शुरू हुई थी, इनमें छह की मौत हो चुकी है।
और फिर आरोप था कि मुफ्त में प्लॉट न मिलने पर महाराजपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्या सागर त्रिपाठी ने 12 लोग पकड़े और फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उनकी गिरफ्तारी भी कर ली।
इसके साथ ही महाराजपुर थाने में 22 अगस्त 1991 को तत्कालीन थाना प्रभारी विद्या सागर त्रिपाठी ने दर्ज मुकदमें में जिक्र किया था कि नर्वल मोड़ पर बदमाश वाहनों को रोककर लूटपाट भी कर रहे थे।
और पुलिस पहुंची तो बदमाशों ने फायरिंग शुरू कर दी। फिर बदमाशों के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई।
फिर मुठभेड़ के बाद गांधीग्राम निवासी राकेश पाठक व उसके साथियों को गिरफ्तार भी किया गया।
फिर उनके पास से अवैध असलहे व विस्फोटक पदार्थ भी बरामद भी हुआ। मुकदमे दर्ज कर सभी को जेल भी भेज दिया गया।
साथ ही मुख्य आरोपित राकेश पाठक के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक ने मुठभेड़ को फर्जी बताया और शासन में शिकायत भी की।
और देव प्रसाद ने बताया था कि पुलिस उनके घर से पिता की लाइसेंसी डबल बैरल बंदूक व लाइसेंसी रायफल भी ले गई। फिर उन्हीं असलहों को मुठभेड़ में प्रयुक्त भी दिखा दिया।
और फिर इन आरोपों के बाद शासन ने मामले की जांच सीबीसीआइडी को सौंपी। फिर तत्कालीन इंस्पेक्टर आरपी सिंह ने जांच भी शुरू की तो पुलिस ने जिस डीसीएम चालक के साथ लूट व मारपीट का घटना में जिक्र किया था।
और उस चालक ने पुलिस की कहानी की पोल भी खोल दी। फिर उसने बताया कि रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही ने कई लोगों को गाड़ी में भी बैठाया।
फिर इसके बाद महाराजपुर थाने से कुछ अन्य पुलिसकर्मी साथ में बैठ भी गए। और नर्वल मोड़ में जाकर पुलिस ने गाड़ी खड़ी करा दी और मुठभेड़ का रूप भी दे दिया।
और फिर 25 सितंबर 1995 को ही अंतिम जांच रिपोर्ट के बाद ही घटना में शामिल सभी पुलिसकर्मियों को दोषी भी पाया गया था।