भारत का एक ऐसा गांव जहां नहीं चलता भारतीय कानून, जानें एक ऐसे गांव के बारे में

वैसे तो पूरा देश ही भारतीय संविधान और कानून के दायरे में आता है लेकिन भारत में एक ऐसा गांव भी है, जहां देश का कानून लागू नहीं होता। इस गांव का अपना संविधान है। यहां के लोगों की अपनी न्यायपालिका है, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका है।

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न्यूज़लिंक हिंदी। हर नागरिक को भारतीय संविधान के मुताबिक कुछ अधिकार दिए गए है, वहीं उनके कुछ कर्तव्य भी बताए गए हैं, जिनका अनुसरण कर वह एक आदर्श नागरिक बनते हैं। वैसे तो पूरा देश ही भारतीय संविधान और कानून के दायरे में आता है लेकिन भारत में एक ऐसा गांव भी है, जहां देश का कानून लागू नहीं होता। इस गांव का अपना संविधान है। यहां के लोगों की अपनी न्यायपालिका है, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका है।

भारत का हिस्सा होते हुए भी खुद का कानून और संविधान लागू करने वाले इस गांव का इतिहास और यहां का रहन-सहन बहुत अलग है। भारत में कई अजब-गजब जगहे हैं, उन्हीं में से एक मलाणा गांव है। यह गांव हिमाचल प्रदेश में स्थित है। इस गांव का अपना खुद का संविधान और संसद है। यहां भारतीय कानून नहीं चलता। गांव के लोगों के अपने नियम हैं, जिनका वह पालन करते हैं।

 

जानें कहां हैं मलाणा गांव
बता दे कि मलाणा गांव हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के दुर्गम इलाके में स्थित है। यहां पहुंचने के लिए कुल्लू से महज 45 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है। हालांकि यहां पहुंचना इतना आसान नहीं है। इस गांव के लिए हिमाचल परिवहन की सिर्फ एक बस ही जाती है, जो कि कुल्लू से दोपहर तीन बजे रवाना होती है।

जानें मलाणा गांव के नियम
इस गांव के कुछ नियम काफी अजीब हैं। इसमें से एक नियम है कि गांव की दीवार को छूने की मनाही है। गांव की बाहरी दीवार को कोई भी बाहर से आने वाला व्यक्ति छू नहीं सकता और न ही पार कर सकता है। अगर वह नियम तोड़ते हैं तो उन्हें जुर्माना देना पड़ सकता है। पर्यटकों को गांव के बाहर ही टेंट में ठहरना होता है, ताकि वह गांव की दीवार तक को छू न सकें।

जानें मलाणा गांव का कानून
भारत का हिस्सा होने के बाद भी हिमाचल प्रदेश के इस गांव की खुद की न्यायपालिका है। गांव की अपनी संसद है, जिसमें दो सदन है- पहली ज्योष्ठांग और दूसरी कनिष्ठांग बता दे कि ज्येष्ठांग में कुल 11 सदस्य हैं, इनमें से तीन कारदार, गुरु व पुजारी होते हैं, जो कि स्थाई सदस्य हैं। बाकि के आठ सदस्यों को ग्रामीण मतदान करके चयनित करते हैं। कनिष्ठांग सदन में गांव के हर घर से एक सदस्य प्रतिनिधि होता है। संसद भवन के तौर पर यहां एक ऐतिहासिक चौपाल है, जहां सारे विवादों के फैसले होते हैं।

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