ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह भूमि विवाद और उत्तर प्रदेश के ही संभल जामा मस्जिद विवाद में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित आपसी सहमति से विवाद से ही समाधान प्रक्रिया में शामिल होने से पूर्ण इनकार कर दिया है।
और फिर दोनों पक्षों का कहना है कि इन मामलों का निपटारा अदालत में कानूनी आधार पर ही होना चाहिए। फिर उनका कहना है कि ये मुद्दा एक जगह का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में तीनों मामलों के सभी पक्षकारों को पत्र भेजकर ही सुप्रीम कोर्ट एक्शन फॉर मेडिएटेड एडजुडिकेशन एंड डिस्प्यूट्स हार्मोनाइजेशन और अक्रॉस नेशन के तहत ही समझौते के जरिए समाधान तलाशने का प्रस्ताव भी दिया था।
और फिर इस पहल का समापन 21 से 23 अगस्त के बीच आयोजित विशेष लोक अदालत में ही होना है।
हालांकि, हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं और तीनों मस्जिदों की प्रबंधन समितियों ने सुप्रीम कोर्ट तथा संबंधित राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को सूचित भी किया है कि वे इस मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने के इच्छुक भी नहीं हैं।
और फिर मामलों से जुड़े वकीलों और पक्षकारों का कहना है कि पूजा स्थलों पर स्वामित्व, संवैधानिक अधिकारों और व्यापक जनहित से जुड़े ऐसे संवेदनशील मामलों का फैसला अदालत द्वारा ही किया जाना चाहिए।
न कि लोक अदालत या मध्यस्थता के माध्यम से. मस्जिद प्रबंधन समितियों के प्रतिनिधियों ने भी कहा कि वे विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर हैं। लेकिन इन मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजने के इच्छुक भी नहीं हैं।
फिर अब गौरतलब है कि समाधान समारोह-2026 की घोषणा इस साल अप्रैल में की गई थी। फिर इसका उद्देश्य लंबित मामलों का स्वैच्छिक और सहमति आधारित समाधान भी कराना है।
और अब इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन पोर्टल और एक केंद्रीय समन्वय तंत्र भी स्थापित किया है। फिर तीनों विवादों में व्यापक कानूनी और संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं।
फिर जिनमें पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की व्याख्या और उसके दायरे से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं, इन मामलों पर अंतिम फैसला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में ही लंबित है।