इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब ये कहा कि पब्लिक गैंबलिंग एक्ट-1867 की धारा 13 के तहत सड़क या सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलना संज्ञेय भी अपराध है।
फिर इसमें एफआईआर और गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी नहीं है। फिर इसी टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने आगरा की विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक कार्रवाई पर कामरान की रोक लगाने की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी।
और फिर कोर्ट ने कहा कि जब किसी कानून में पुलिस अधिकारी को सीधे गिरफ्तारी का अधिकार दिया गया हो। तो वह अपराध स्वतः ही संज्ञेय की श्रेणी में आता है।
साथ ही सीआरपीसी की धारा 2(सी) के तहत पुलिस मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना एफआईआर भी दर्ज कर सकती है और फिर इस मामले की जांच भी कर सकती है।
इसके साथ ही पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती और न ही अपराध की जांच का अधिकार है।
पुलिस ने जांच शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति नहीं ली। फिर इसलिए एफआईआर के बाद से की गई कार्रवाई शुरू से ही अमान्य है।
और फिर इस पर कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारी बिना वारंट के किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है।
और फिर जो पैसे के लिए जुआ खेलते हुए पाया जाए। साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह तीन महीने में ट्रायल को भी पूरा करे।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पब्लिक गैंबलिंग एक्ट की धारा-13 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि पुलिस अधिकारी सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलते पाए जाने पर आरोपी को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है।
और फिर ऐसे में यह मानने का कोई आधार नहीं है कि इस अपराध के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति की भी आवश्यक होगी।
और फिर पुलिस न सिर्फ गिरफ्तारी कर सकती है, बल्कि सीधे एफआईआर दर्ज कर विवेचना भी कर सकती है।