आज हम आपको एक ऐसे कब्रिस्तान की जानकारी देते हैं, जहां अंकों से कब्रों की पहचान भी होती है।
फिर यह कचहरी के पास स्थित संरक्षित ईसाई कब्रिस्तान है, जो 1700 ईस्वी में अस्तित्व में आया था।
हालांकि वर्ष 1950 के बाद से यानी 76 वर्षों से यहां किसी को नहीं दफनाया भी गया है। फिर इस कब्रिस्तान की देखरेख की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व विभाग के पास है।
और यहां विदेश से शोधार्थी आते रहते हैं। फिर इसको गोरा कब्रिस्तान भी कहते हैं। और यहां हर कब्र पर अंक लिखे हैं।
फिर सबसे पुरानी कब्र पर अंकों में 1781 दर्ज है। ये भी माना जाता है कि यह अंक उस वर्ष को दर्शाते हैं, जब शव को कब्र में दफन भी किया गया।
फिर इसके साथ ही कानपुर का इतिहास समिति के महासचिव अनूप शुक्ला ये भी बताते हैं कि गोरा कब्रिस्तान में हर कब्र पर अंक लिखा है।
और फिर वे ये भी बताते हैं कि कुछ कब्रों पर शिलालेख नहीं थे, इंग्लैंड की लेखिका जोई येलांड ने उनका सर्वेक्षण भी किया।
और पुराने रिकार्ड खंगाले, अग्रेजों के समय के इमेजिंग स्केच देखे। और उसमें दर्ज कब्रों में दफन अंग्रेजों के नाम व कब्रों की स्थिति देखी। उनके आधार पर उनकी पहचान भी की गई।
फिर इसके बाद उनको अंक दिए गए। हालांकि कई कब्रों पर अभी भी शिलालेख लगे हैं। यहां अंक एक पर जान से की पत्नी एनी की कब्र है।
इसके साथ ही 1787 अंक वाली कब्र कर्नल जान स्टेट की, 1804 अंक वाली कब्र एलन लुईस की, और 1852 अंक वाली कब्र जान बैनेट की, 1855 वाली कब्र कर्नल जान की है।
इसके अलावा हीरामन का पुरवा स्थित गोरा कब्रिस्तान में सार्जेंट के नीचे की रैंक के सिपाही दफन किए जाते थे। फिर यह कब्रिस्तान कब्जों में गुम हो चुका है।
और यहां कब्रिस्तान पर ही पक्के मकान बन चुके हैं। इसके साथ ही वर्तमान समय में स्थिति यह है कि केवल गोरा कब्रिस्तान का नाम ही बाकी भी रह गया है।
फिर इसी तरह मीरपुर में भी गोरा कब्रिस्तान कब्जों की भेंट भी चढ़ चुका है। और यहां भी मकानों के नीचें कब्रें भी दब चुकी हैं।