कानपुर नगर नगम अपने कार्यो से ज्यादा कारनामों से चर्चा में रहता है। फिर इस बार टेंड प्रक्रिया को लेकर नगर निगम सवालों के घेरे में है।
और टेंडर होने के बाद भी लंबे समय तक काम न होने के तो कई मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन इस बार मामला चौंकाने वाला है।
फिर काम पहले कर दिए गए और टेंडर बाद में जारी किए गए। अब आरोप है कि कुछ अफसर और ठेकेदार मिलकर पहले अपने चहेतों से काम करा लेते हैं और इसके बाद उसी काम का टेंडर फ्लोट भी किया जाता है।
और वहीं टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले नए ठेकेदारों पर दबाव बनाकर उन्हें टेंडर से हटने के लिए मजबूर भी किया जाता है।
और सभी छह जोनों में इस तरह की शिकायतें पहुंचने के बाद अफसरों में खलबली है।
फिर बीते दिनों कई ठेकेदारों ने नगर आयुक्त से लिखित शिकायत की है, जिसके बाद मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
2025-26 में नगर निगम में नए ठेकेदार के रूप में रजिस्टर्ड एक कंपनी के संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बंदरिया पार्क, रावतपुर के सुंदरीकरण और नौबस्ता चौराहा, हंसपुरम स्थित सामुदायिक केंद्र की रिपेयरिंग-पेंटिंग के टेंडर निकले थे। और दोनों काम नौ लाख रुपये से कम के थे।
टेंडर में हिस्सा लेने के लिए करीब 97 हजार रुपये जमा किए गए थे। फिर ठेकेदार के मुताबिक, एक काम जोन-3 का था।
और टेंडर प्रक्रिया के दौरान जोनल ऑफिस से जेई सिद्धार्थ सिंह का फोन आया और कहा गया कि काम पहले ही हो चुका है।
और इसलिए टेंडर से हटना पड़ेगा। अगले दिन एक अन्य ठेकेदार ने फोन कर भी टेंडर छोड़ने का दबाव बनाया। अब आरोप है कि जोनल ऑफिस पहुंचने पर उससे लिखवाया गया कि वह अपनी इच्छा से टेंडर छोड़ रहा है।
साथ ही ठेकेदारों का आरोप है कि नगर निगम के इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के कुछ अफसरों और पुराने ठेकेदारों की साठगांठ से काम बांटे जाते हैं।
और आरोप है कि शाम होते ही जोनल कार्यालयों में चहेते ठेकेदारों की भीड़ जुटती है। फिर एक ठेकेदार ने बताया कि जेई पसंदीदा ठेकेदारों को फाइलें देते हैं और इसके बदले रकम भी तय होती है।
और सब कुछ पहले से तय होता है। सिर्फ दिखावे के लिए टेंडर प्रक्रिया की जाती है।इसके अलावा नगर निगम में हर साल बड़ी संख्या में नए ठेकेदार रजिस्ट्रेशन कराते हैं।
उन्हें उम्मीद होती है कि नियमों के मुताबिक टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लेकर काम मिलेगा। लेकिन आरोप है कि कुछ समय बाद उन्हें हकीकत का पता चलता है।
और ठेकेदारों का कहना है कि अफसरों या किसी बड़े ठेकेदार के सपोर्ट के बिना टेंडर हासिल करना मुश्किल है।
फिर ऐसे में कई नए ठेकेदार बार-बार टेंडर में हिस्सा लेने की प्रारंभिक राशि भी जमा करते हैं, लेकिन काम भी नहीं मिल पाता।