पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अब युद्धविराम टूटने के कगार पर है। फिर इसकी वजह तुर्की में चल रही बैठक में दोनों पक्षों के बीच हुई तनातनी है।
साथ ही इस्तांबुल वार्ता में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल अपनी-अपनी मांगों पर अड़े भी रहे।
और फिर दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर असहयोग के आरोप भी लगाए। फिर ऐसे में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच गुरुवार से शुरू हुई शांति वार्ता खतरे में पड़ गई है, जिसका उद्देश्य तनाव को बढ़ने से रोकना भी है।
इसके साथ ही तुर्की के सूत्रों का कहना है कि अफगान प्रतिनिधिमंडल ने मध्यस्थों के प्रस्ताव पर अपनी औपचारिक प्रतिक्रिया दी।
फिर इस पर समझौते का रास्ता साफ करने के बजाय पाकिस्तानी डेलीगेशन की ओर से कुछ ऐसी शर्तें पेश कर दी गईं। और फिर जो बातचीत में अड़चन बन गईं।
इन शर्तों को अफगान अधिकारियों ने वार्ता के उद्देश्य से अलग कहकर खारिज भी कर दिया गया।
इसके अलावा अफगान तालिबान से यह गारंटी मांगी है कि पाकिस्तान के अंदर कोई आतंकी घटना उनकी जमीन से बिल्कुल भी नहीं होगी।
और फिर अफगान अधिकारियों का तर्क है कि पाकिस्तान की ओर से इस तरह की शर्त व्यावहारिक भी नहीं है।
फिर खासतौर से पाकिस्तान के जटिल घरेलू सुरक्षा परिदृश्य का हवाला तालिबान ने ही दिया है। फिर काबुल का कहना है कि कोई पड़ोसी देश ऐसी गारंटी बिल्कुल भी नहीं दे सकता।
ये भी बता दें कि सीमा पर गोलीबारी के बाद दोनों पक्षों के बीच 15 अक्टूबर को संघर्षविराम पर सहमति बनी थी।
फिर इसे 19 अक्टूबर को दोहा और 25 अक्टूबर को इस्तांबुल में हुई वार्ताओं के दौरान आगे भी बढ़ाया गया। और अब तीसरे दौर की बातचीत भी हो रही है।
साथ ही संघर्ष विराम पर लगातार संकट के बादल भी छाए हैं क्योंकि दोनों पक्षों के अधिकारियों के बयानों में कटुता साफ झलक भी रही है।
बहरहाल इस्तांबुल में हुई पिछली वार्ता भी असफल होने की कगार पर भी पहुंच गई थी लेकिन तुर्की के हस्तक्षेप से स्थिति अभी संभली।