Kanpur: यशोदानगर इलाके में बन रहे कनपुरिया अबीर गुलाल की बढ़ी मांग, प्रदेश के कई जिलो में रंग भेजने का शीलहिला हुआ जारी

रंगों का त्यौहार कहे जाने वाले होली के पर्व की तैयारी जोरो पर है शहर के यशोदानगर इलाके में इन दिनों होली के लिए तैयार किये जा रहे अबीरगुलाल को जोरो से तैयार कर प्रदेश और शहर के कई हिस्सो में भेजने का सिलसिला शुरू हो गया है।

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न्यूज़लिंक हिंदी, कानपुर। रंगों का त्यौहार कहे जाने वाले होली के पर्व की तैयारी जोरो पर है शहर के यशोदानगर इलाके में इन दिनों होली के लिए तैयार किये जा रहे अबीरगुलाल को जोरो से तैयार कर प्रदेश और शहर के कई हिस्सो में भेजने का सिलसिला शुरू हो गया है। जिसको लेकर व्यपारी ज्यादा से ज्यादा माल तैयार करने में लगे हुए है शहर का अबीर और गुलाल की पूरे प्रदेश में सप्लाई की जाती है वही कानपुर को रंगों का किंग भी माना जाता है। जिसको लेकर प्रदेश के कई जिलो से लोग यहां पर रंग ख़रीदे के लिए आते है।

यशोदा नगर इलाके में इन दिनों जिधर भी नजर दौड़ाओ बस अबीर और गुलाल से लदे हुए खेत ही दिखाई पड़ते है वैसे तो खेतो में गेहू चना और सब्जियां बोई जाती है लेकिन शहर का यह इलाका इन दिनों पूरी तरह होली के रंगों में रँगा हुआ दिखाई देता है फिर क्या गली और क्या खेत हर तरफ अबीर और गुलाल के ढेर ही दिखाई देते है।

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जिधर भी नजर डालो अबीर और गुलाल के बड़े बड़े ढेर पर महिलाये और पुरुष काम करते हुए होली की तैयारी में जुटे हुए है। यहां पर अबीर और गुलाल को साफ़ तरीके से तैयार किया जाता है और सप्लाई के लिए बहार भेज दिया जाता है। यहाँ पर लगभग हर चौथे घर में अबीर और गुलाल बनाया जाता है। चुकी यह इलाका शहर से हटकर है इस लिए यहां आराम से रंगों को सुखाया जाता है।

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हमारे यहां अबीर और गुलाल ही बनाया जाता है और इसे बनाने में विशेष ख्याल रक्खा जाता है क्योकि शहर से यह माला मथुरा, वृन्दावव, आगरा, लखनऊ, गोरखपुर, बस्ती, गाजियाबाद, मेरठ तक जाता है इसे तैयार करने के लिए हम लोग आरारोट का इस्तेमाल करते है और उसमे रंग मिला देते है जिस रंग का माल देना होता है वह रंग आरारोट में मिलाकर उसे मशीन में मिलाते है मिलाने के दौरान उसमे पानी भी डालते है और जब सही तरीके से रंग मिल जाता है तो उसको मशीन से निकाल कर बहार खेतो में सूखने के लिए डाल देते है और करीब दो घंटे में जब वह पूरी तरह सुख जाता है तब उसकी छनाई कराई जाती है और उसमे निकलने वाली गंदगी और बहार फेक दिया जाता है। फिर उसमे सुगंध के लिए सेंट भी डाला जाता है और उसके बाद उसकी पचास किलो और तीस किलो की पैकिंग कर उसकी सप्लाई भेज दी जाती है।

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